गुमनामी…

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इस शहर में दिए नही दिल जला करते है

तुम्हे क्या तुम मुसाफिर हो सफर किया करो

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उसका दिल तोड़ कर मुझे भी बहुत दर्द हुआ

उसकी सिसकियों भरी आवाज़े सोने नही दी रात भर

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क्या करता मैं भी उसका दिल तोड़ने के लिए खुद को बहुत मजबूर किया था

कुछ वक़्त का दर्द देकर उसकी झोली खुशियों से भर दिया मैंने

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उसकी आवाज़ मेरे कानो में अब भी गूंज रही है

वो जो कई बार मेरा नाम प्यार से पुकार गयी थी

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एक मैं हूँ तन्हाई ही तन्हाई मुझमे

और दुनिया है के शोर शराबे की महफ़िल

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कभी ये शहर अँधेरे और गुमनामी को बयां करता था

हमने अपना दिल जलाया तो लोग चले आये जहा तक उन्हें रौशनी मिली

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© 2018 Md Danish Ansari

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6 विचार “गुमनामी…&rdquo पर;

  1. kya baat…..bahut badhiya Danish ji….

    हम उसे बुलाते हैं अब तन्हां रातों में,
    हम नीर बहाते हैं छुप -छुपकर रातों में,
    जो चला गया ना मुड़कर देखा,
    उसकी यादों में,
    हम नीर बहाते हैं छुप -छुपकर रातों में|2

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