रानी पद्मावती , राजा रतनसिंह , सुलतान अल्लाउद्दीन खिलजी

Padmavati (1)

पद्मावती मलिक मोहम्मद जायसी की कल्पना मात्र है या फिर इसमें कोई सच्चाई भी मौजूद है , पद्मावती तक पहुचने से पहले हमे या जान लेना चाहिए की मलिक मोहम्मद जायसी ने इसे कब लिखा जायसी ने यह साहित्य खिलजी साम्राज्य के अंत के बाद उसके २५० साल बाद लिखा , ऐसे में जाहिर है खिलजी और उसके वंश और साम्राज्य के आस पास बहुत सारी मनघडंत कहानिया और अंध विश्वास भी पनपा होगा | क्योकि ज्यादातर इतिहासकार यही लिखते है की पद्मावती कभी थी ही नहीं खिलजी ने पद्मावती के लिए चितौड़ पे आक्रमण नहीं किया बल्कि उस किले को हासिल करना था जिसमे राजा रतनसिंह रहा करते थे यह खिलजी के लिए बहुत जरुरी था की वह अपने साम्राज्य का विस्तार करे क्योकि दिल्ली में अल्लाउद्दीन खिलजी से पहले जितने भी सुल्तान हुए वो सब इतने अय्याश हुए की दिल्ली का खजाना खाली था उसे खुद की सुरक्षा के लिए भी सैनिक कम पड़ रहे थे जो थे उन्हें तनख्वाह देने के लिए खजाना खाली था तब अलाउद्दीन खिलजी ने सभी अपने विश्वास पात्र लोगो को बुला कर उसे राय लिया की क्या किया जाये की खजाना फिर से भरा जा सके ज्यादातर ने यह कहा की लोगो पे कर बढ़ा दिया जाये लेकिन खिलजी जानता था की लोगो के पास पहले से ही कुछ देने को नहीं है जनता मुस्किल से एक वक़्त का भोजन जुटा पा रही है ऐसे में उसके ऊपर और ज्यादा कर लगाना यानि जनता में विद्रोह की आग को जलाना , फिर खिलजी के एक सिपाह सलार ने उन्हें सुझाओ दिया की अगर आप सल्तनत में बढती महंगाई को काबू कर ले तो जनता ख़ुशी ख़ुशी कर देने लगेगी | अल्लाउद्दीन खिलजी को यह विचार पसंद आया और उसने फ़ौरन यह आदेश दिया की पूरी सल्तनत में बड़े बड़े भण्डार गृह बनाया जाए और उसके साथ ही मार्किट भी जहा वस्तुओ का एक निश्चित मूल्य होगा उस मूल्य से अधिक मूल्य पे किसी भी सामान को बेचने वाला अपराधी होगा और उसे उस बाज़ार के प्रवेश द्वार पे कोड़े मारे जाये ताकि कोई भी इस नियमो का उलंघन न करे और ऐसा हुआ भी पूरी जनता सिर्फ इन्ही मार्किट से सामान लेती क्योकि उन्हें उचित दामो में यह सब मिलता बाहर से लोग सामान खरीदना बंद कर दिए क्योकि वहा ज्यादा मूल्य देना पड़ता जिससे व्यवपारी वर्ग भी अब अपना सामान उन्ही मार्किट से बेचने पर मजबूर हो गए सल्तनत में कही किसी और जगह आप अपना सामान नहीं बेच सकते थे यह अपराधी श्रेणी में ला दिया गया | इन  सब से यह हुआ की जनता को सही दाम पर सही चीजे मिली और महंगाई भी कम हो गयी जिससे जनता के पास अब धन आने लगा जिससे वो दिल्ली सल्तनत का कर भी देने लगे और देखते ही देखते सल्तनत में फिर खुशहाली लौट आई , यहीं से शुरु होता है खिलजी के साम्राज्य विस्तार की कहानी उसने चार लाख से भी ज्यादा बड़ी सेना खड़ी किया और उसने पश्चिम में अपना विस्तार जारी रखा अफगानिस्तान पाकिस्तान ये सब उसकी सल्तनत के हिस्से बने अल्लाउद्दीन खिलजी हमेशा मंगोल से परेशां रहता लेकिन भारत के लिए यह जरुरी भी था की उत्तर में कोई ऐसी ताक़त हो जो मंगोल को रोक सके उनसे लोहा ले सके और वह था खिलजी खिलजी से कई बार मंगोलों की लड़ाई हुई और हर बार मंगोलों को अपनी जान बचा के भागना पड़ा | एक बार खिलजी के गुप्तचरों ने यह बताया की मंगोल हमले की तैयारी कर रहे है तो उसने तुरंत अपनी सेना को लेकर मंगोलों पर धावा बोल दिया और एक ही दिन में सभी को ख़त्म किया वहा से उसे लगभग ३०००० औरते मिली जिसे उसने अपने हरम में शामिल कर लिया | खिलजी को हमेशा से चितौडगढ़ का किला जितने की ख्वाहिश रही क्योकि यह न सिर्फ उसके साम्राज्य के लिए फायदेमंद था बल्कि यह अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उत्तर पे काबू रखने का एक बेहतरीन किला था साथ ही इस किले की महत्वा इस लिए भी था की यह उचाई पे खड़ी ढलान पे बना था जिससे इसपे कब्ज़ा करना बहुत मुश्किल था आप किले के अन्दर से ही पुरे बाहर के स्थिति पे नज़र रख सकते थे की दुश्मन क्या कर रहा है और यही सारी खासियत खिलजी के लिए भी परेशानी का सबब बनी हुयी थी खैर आखिरकार खिलजी ने इसे भी फ़तेह किया और इसी तरह खिलजी ने अपने साम्राज्य का विस्तार जारी रखा और देखते ही देखते उसके साम्राज्य में गुजरात रणथंबोर मेवाड़ मालवा जालौर वरंगल माबर और मदुराई को जीत लिया उसने अपना साम्राज्य दक्षिण तक फैला दिया जो की कभी नहीं हुआ था लेकिन यह काम अल्लाउद्दीन खिलजी ने किया अपनी सूझ बुझ और ताक़तवर सेना के बल पर , अल्लाउद्दीन खिलजी को उस दौर में लोग सिकंदर ए शाही के नाम से भी जाना जाता था जिसका मतलब था दूसरा सिकंदर यह इस लिए भी हुआ क्योकि उस ज़माने में सिकंदर के बाद अगर किसी ने इतना बड़ा साम्राज्य अगर खड़ा किया था तो वह सिर्फ अल्लाउद्दीन खिलजी ही था | खैर अब आते है फिर से पद्मावती पर आपने अमीर ख़ुसरो के बारे में तो सुना ही होगा अमीर ख़ुसरो खिलजी के ही वक़्त के कवी है उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम में खिलजी के पुरे दौर का जिक्र कर रखा है उसकी एक तरह से पूरी जीवन गाथा है उसके अच्छे दौर भी और बुरे दौर भी अमीर ख़ुसरो ने यह तो जिक्र किया है की खिलजी ने चितौडगढ़ पर आक्रमण किया जिसमे महान और बहादुर चितौडगढ़ के महाराज वीर गति को प्राप्त हुए लेकिन अपनी कविता में कहीं पे भी अमीर ख़ुसरो ने पद्मावती या पद्मनी का जिक्र नहीं किया है , हाँ इतिहास में यह जरुर दर्ज है की खिलजी की बहुत सारी हिन्दू रानियाँ थी जो अक्सर युद्ध के बाद राजा राजवाड़े अपनी किसी भी बेटी की शादी जितने वाले राजा से कर दिया करते थे और यह आम बात थी उस ज़माने के लिए | अगर आप किसी भी राजा रजवाड़े का इतिहास पढोगे तो आपको यह नॉर्मली पढने को मिल जायेगा की हारे हुए राजा ने अपनी बेटी का विवाह विजय राजा से कर दिया था यह नार्मल था यह एक तरह से विश्वास बनाये रखने का तरीका था ताकि हारा हुआ राज्य फिर से तुरंत बगावत न कर दे | खैर न तो अमीर ख़ुसरो की कविताओं में कहीं पद्मावती थी न पद्मनी और न ही इतिहास की किसी पन्ने पर फिर इसके २५० साल बाद पुरे खिलजी साम्राज्य के पतन के बाद मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत लिखा जिसमे पद्मावती का जिक्र आया पहली बार फिर उसके बाद हरियाणवी कविओं में एक और किताब आई जो जायसी की पद्मावत की ही कॉपी है कुछ फेर बदल के साथ उसके बाद कुछ और भी किताबे आई जायसी की पद्मावत के आधार पे जो पद्मावती का जिक्र करती है लेकिन जायसी से पहले किसी भी इतिहास के पन्ने पर पद्मावती नहीं है | एक उम्दा रचनाकार या कवी वही होता है जिसकी कल्पना को लोग सच मान बैठे और यह सच है की जायसी एक उम्दा कवी है क्योकि लोग उनकी पद्मावती को सच मानते है , खैर इस तरह के तर्क पे अक्सर लोग यह कहते है की अगर पद्मावती नहीं थी तो जोहर किसने किया ?? यह सवाल करने वाले लोग अक्सर यह भूल जाते है की रतनसिंह की कोई एक बीवी नहीं थी बहुत सी थी जो की उस ज़माने में अक्सर राजा रजवाड़े सुलतान बादशाह रखा करते थे क्योकि यह उस ज़माने की मान्यता के हिसाब से यह उचे लोगो और मान सम्मान रौब वगेरा वगेरा के निशानी थी इसी लिए अकसर आपको राजाओ के एक से ज्यादा पत्नी होने का प्रमाण मिल जायेगा | इतिहासकार यह तो स्वीकार करते है की चितौडगढ़ के किले में जोहर हुआ था लेकिन वह इस बात से साफ़ इनकार कर देते है की उसमे पद्मावती नाम की कोई रानी भी थी क्योकि जायसी की रचना पद्मावती से पहले आपको पद्मावती का एक छुट पुट अंश भी इतिहास के पन्नो या उस दौर में लिखी किताबो या कहानियों या कविताओं में नहीं मिलती वरना पद्मावती होती खिलजी उस पर फ़िदा होता और इस इतने बड़े बात को अमीर ख़ुसरो मिस कर जाये अपनी कविताओं में यह हो नहीं सकता अगर अमीर ख़ुसरो मिस भी कर गए तो दुसरे मिस कर जाये यह भी संभव नहीं है , तो इस तरह में इस नतीजे पे पहुँचा हूँ की राजा रतनसिंह भी थे और खिलजी भी था युद्ध भी था वीर गति भी था पराजय भी था और विजय भी थी लेकिन इन सभी में कहीं भी पद्मावती नहीं थी लेकिन यह सिर्फ और सिर्फ मेरा अपना नज़रियाँ है जरुरी नहीं की यह आपका भी हो |

खैर संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती इतिहासिक नहीं बल्कि सिर्फ कल्पना है क्योकि इसमें नोट करने वाली बात यह भी है की इस फिल्म में जहा राजा रतनसिंह को हीरो दिखाया गया है वही खिलजी को विलन मगर क्या ऐसा वाकई हो सकता है हमे यह समझना होगा की इतिहास में जो भी हुआ वह उनका था हमारा नहीं हमारा बस आज है खिलजी ने जो किया वह राजा होने के अपने फैसलों के तहत किया न की धर्म के प्रचार प्रसार के लिए क्योकि इसके पुरे प्रमाण है खिलजी ने धर्म और धर्म गुरुओं को हमेशा अपने राज काज से दूर रखा उन्हें कोई शक्ति नहीं दी गयी जिससे वह कोई भी फैसला ले | साथ ही राजा रतनसिंह भी वीर और बहादुर शासक हुए क्योकि उन्होंने खिलजी के सामने हथियार नहीं डाले बल्कि उससे लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए अब दोनों ही अपनी जगह पे सही थे क्या खिलजी के आक्रमण से पहले हिन्दू राजा आपस में नहीं लड़ते थे अगर खिलजी ने अपने चाचा का क़त्ल करके गद्दी हाशिल की तो अशोक ने भी तो क़त्ल करके ही गद्दी हाशिल की अगर आप राजाओ के इतिहास को पढेंगे दुनिया भर के तो आपको यह नॉर्मली पढने को मिल ही जायेगा की उन्ही के किसी अपने ने पहले राजा का क़त्ल करके खुद को राजा घोषित किया |

आप इन राजाओ को अच्छे या बुरे के तराजू में नहीं तोल सकते हाँ आप इतना जरुर कर सकते है की आप उनके द्वारा लिए गए फैसलों और कार्यों से उन्हें कम या ज्यादा जरुर कह सकते है लेकिन आप उनमे से किसी एक को हीरो या विलन नहीं बना सकते न ही मान सकते है इसके बावजूद अगर आप ऐसा करे तो फिर इसमें कोई दूसरा कुछ नहीं कर सकता |

हॉलीवुड में जब भी  कोई फिल्म बनती है तो वह फिल्म के शुरु में ही यह दिखा देते है की यह फिल्म इतिहासिक है मगर यह हमारा आज नहीं है इसमें दिखाए हुए किरदार सच में थे लेकिन उनका हमारे आज से कोई वास्ता नहीं है यह फिल्म सिर्फ इतिहास की एक छवि मात्र है यह संपूर्ण इतिहास नहीं है इसमें दिखाए गए विचार और तथ्य उस ज़माने के लोगो के थे न की हमारे जैसे की अमेरिका में एक सीरियल बनी थी ब्लैक और वाइट पर जिसका नाम है रूट इसमें सब कुछ वैसा ही दिखाया गया है जैसा हुआ था इसमें कहीं भी कलाकारों की कलात्मकता इतिहास पर हावी नहीं होती लेकिन हमारे बॉलीवुड में ये खामी है की जब भी वह कोई इतिहासिक फिल्म बनाते है तो उसमे डायरेक्टर और कलाकारों की कलात्मकता हावी हो जाती है और इतिहास किसी कोने में चला जाता है वो इतिहास को इतना तोड़ मरोड़ देते है की फिर समझ नहीं आता की क्या इतिहास है और क्या फिल्मकार की कलात्मकता | लेकिन ऐसा सभी के साथ भी नहीं है अब जैसे अगर आप राज्य सभा टीवी के द्वारा बनाया गया सीरियल संविधान देखेंगे तो आप को यह महसूस खुद हो जायेगा की यह वाकई हमारा इतिहास है जिसमे किसी को अच्छा बुरा नहीं दिखाया गया है बस वही दिखाया गया है जो हुआ था न ही जिन्ना जी को बुरा कहा गया है न नेहरु जी को न गाँधी जी को न बोस जी को न पटेल जी को न ही भीमराव आंबेडकर जी को बस वही दिखाया गया जो हुआ था मेरा सुझाओ है की आप को यह जरुर देखना चाहिए आपको इससे मदद मिलेगी या फिर आप ट्रॉय भी देख सकते है जो एक इतिहासिक फिल्म है जो हॉलीवुड में बनी है |

नोट :- यह पोस्ट किसी भी व्यक्ति समाज या खास लोगो की आस्था को चोट पहुँचाना या किसी को बदनाम करना नहीं है इसका मकसद सिर्फ एक है अपनी बुद्धि और सुझबुझ से सत्य की और जाना जितना हो सके सत्य के करीब बने रहना इसके बावजूद अगर इस लेख से या लेखक के द्वारा लिखी किसी बात से किसी की भावना को ठेस पहुँचती है तो इसके लिए क्षमा का प्रार्थी हूँ |

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© 2017 Md Danish Ansari

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9 विचार “रानी पद्मावती , राजा रतनसिंह , सुलतान अल्लाउद्दीन खिलजी&rdquo पर;

  1. हम दोनों भाईयों की विचारधाराएं हमेशा टकराती रहेंगी दानिश भाई।जिसे हम आक्रांता समझते हैं उसे आप सिंघाशन का खेल समझते हैं।जिसमे ना ही आपका और ना ही मेरा कसूर है सब उस हालात का कसूर है जिसे हमारे पूर्वजों ने झेला।।जब हम दादी की दादी का नाम नहीं जानते फिर कोई 1000 वर्ष पुराने जख्म जो उसके ही परिवार ने झेला कैसे जान सकता है।। क्या पता खिलजी के समय आप भी हमारे कतार में हों जो उन आक्रांता का दंश झेल रहे थे।मगर उसे कौन याद करता है।अगर कुछ गलत लिख दिया तो माफ कीजियेगा।।

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  2. bilkul nahi Madhusudan ji apne kuch galat nahi kaha or waise bhi hum khud ko bhartiya mante hai na ki khilji or mugals ke vash se khud ko jodte hai lekin itihaas ke mamle me humara yahi manna hai ki itihaas ko itihaas rahne dena chahiye wo jaisa bhi tha chahe wah crue tha ya dayawan chahe wo samridh tha ya dayniy use waisa hi rehne diya jaye kyoki itihaas ka adhyayn isliye hai ki ham usse sikhe or behtar bane magar yaha to log itihaas ko tod marod ke aise dekhte hai ki bas usse aakramakta hi badhni hai usse jyada kuch nahi

    hum log me ek kahawat mash hoor hai ki – agyanta upadrav laati hai gyan nahi

    or aaj kal jo ho raha hai wo sab agyanta ki wajah se hai na ki dharm jati samradaay ya sanskriti ki wajah se

    rahi baat Madhusudan ji aap unhe aakranta is liye maante hai kyoki ap ka nazariya ye hai ki wo bahar se aaye jo ek tarah se sahi bhi hai galat nahi lekin agar aap manav sabhyata ko dekhe to yah payenge ki manushya kisi ek bhoomi pe vichran nahi karta or rahi baat mulk ki to us samay mulk ko utna mahatva nahi diya jata tha sab sirf apne rajya ke liye ladte the roman ki baat ho ya british ki american ya faras ki ya mangole ya turkey ye sab vichran karte rahe kuch jitne ke liye kuch gyan ke liye kuch romanch ke liye waise bhi mulk insaano ne banaye khuda ne nahi mulk kal bhi bante the aaj bhi bante hai mulk kal bhi mit gaye aaj bhi mit rahe hai or yah satya hai lekin in sab ke bawajud hume apne mulk ke liye ladna hoga kyoki apna ghar har kisi ko pyara hai

    rahi baat jakhmo ki to hum itihaas me nahi ji sakte yah jaruri hai ki hum unki veerta ko samman de lekin iska matlab yah katai nahi ki kal ke liye aap aaj ko jala kar raakh kar de sab kuch sighasan ke liye tha aaj bhi ek mulk dusre mulk ke singhasan ko girane par tula hai kabhi satta palat ke kabhi bagawat se kabhi kranti se ye to hum tay karte hai paristhitiyon ke anuroop ki ham kis taraf honge

    kuch galat keh diya ho to maafi

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    1. बहुत अच्छा लगा आपका ये कमेंट पढ़कर।।आपका कमेंट्स आपके लेख से कहीं बेहतर है।निश्चित भूत की कीमत पर वर्तमान हम कत्तई नही बर्बाद करना चाहेंगे साथ ही नफरत बिल्कुल नहीं।अगर इस बिषय पर अति हो रहा ना ही उसे हम पसन्द करते हैं ना ही कोई किसी जाति या मजहब का नाम लेकर कोई कहानी बनाये और उसमें किसी जाति को इंगित कर अश्लीलता दिखाए उसको पसन्द कर सकते।।हम चाहेंगे कि साफ सुथरी पिक्चर जरूर रिलीज हो।।धन्यवाद आपका।हमे गर्व है कि हम हिन्दू है और बहुत गर्व से करते हैं कि आप जैसे मुश्लिम भाई इस देश के हैं।।हम दोनों पर देश को नाज है।

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      1. bilkul madhusudan ji jab tak log ek dusre se baat nahi karenge tab tak wo sab galat fahmi me hi jiyenge or bas ek dusre ko galat kehte rahenge hum sabhi ke vichar alag hai or jahir hai koi bhi vyakti sabhi vicharo se sahmat nahi ho sakta lekin tamam asahmation me bhi kisi ek pe sahmati banana hi to uchch samaj ka nirmaan karta hai :- P. Jwahar Lal Nehru Ji

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      2. jab sirf ek dharm tha tab bhi jang hote they……jaise jaise dharm badhte gaye…..jang men kabhi kami nahi aayee……ham jang ko dharm se nahi jod sakte ……magar kisi bhi bahri akraanta ko …….dil kshamaa bhi nahi kar sakte ……pahle bhi akraman hota tha…..magar raja aur raajaa ladte they …..jaise hi raajaa haar jaata. thaa uske sainik atmsamarpan kar dete they aur praja jaisi ki taisi rahti thi…magar in turk,arab aur afgaani ke samay janta bhi raund di gayee …….besak inko dharm ka guru nahi banaya gaya magar dharm ka nangaa naach kiyaa inhone…….manav ko daas banaanaa arab le jaakar nilaami karnaa ….aurton ko aurat nahi samajhnaa …..tang aakar aurton dwara jauhar karnaa …….nalanda aur bikramshilaa jaise bishwabikhyat bishwabidyaalay men hajaaron barson ki padi gyaan ko jalaa denaa……..jitni bhi ginti karun aur jitne bhi ithihaas unhone mitaaye…..ab bhi itne bhare pade hain…….jo unhen akraantaa kahne ke liye kaphi hai…….magar iskaa ye kattayee matlab nahi ki aaj ke hamare mushlim bhaayee gunahgaar hain…….agar kuchh vivad hai to unhi kaa diyaa huaa….jiske karan ham sabhi thoda bahut lad bhi rahe hain……..
        pariwartan sansaar kaa niyam hai……parivartan hota rahegaa………….magar prem sab din jinda rahaa hai aur jinda rahega………dharm bhi bante aur badalte rahenge……….sukriya Danish bhayee….vishay se vishyantar ho raha hai…….sukriya apka.

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  3. जो किसी दूसरे जाति,धर्म,क्षेत्र,भावनाओं को आहत करे वह आक्रांता है ये मेरा मानना है।जो अपने विचारों को दूसरों पर जबर्दस्ती थोपे वह आक्रांता है।।

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