मैं हिंदुस्तान हूँ- जिहाद, आतंकवाद, दंगा

मैं हिंदुस्तान हूँ
जिहाद, आतंकवाद, दंगा
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लहू बहा के तुम अपनो का कह देते हो यही जिहाद है
तुम कैसे मूर्ख हो गुस्से में आ कर कह देते हो
यही इस्लाम है यही मुसलमान है
पढ़ के देख लो तुम दोनों, क़ुरान के हर कलाम को
अपने अंदर की बुराई को खत्म करना सच्चा जिहाद है
क्रोध के प्रतिशोध में आ कर तुमने अपने भाई का लहू बहाया
तूने भी तो महान भगवत गीता का पाठ भुलाया
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हाँ लिखा है दोनों में जुल्म न सहो चुप चाप
लेकिन तुम दोनों ने भी तो इसी का सहारा लेकर
बेगुनाहों का भी लहू बहाया
तुम इसे आतंकवाद नही कहते तुम इसे जिहाद नही कहते
तुम इसे कहते हो यह दंगा है
पर सच यही है अगर वो जिहाद है तो यह भी जिहाद है
अगर वो आतंकवाद है तो यह भी आतंकवाद है
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सबसे पहले तुमने मुझे 1946 में कलकत्ते पे वार किया
फिर तुम सबने मुझे 1984 सिख विरोधी दंगा दिया
फिर मेरे हिस्से एक और दंगा 1986 कश्मीर आया
फिर पलट वार तुमने वाराणसी 1989 दंगा कर डाला
तुम सबने भागलपुर 1989 मेरे हिस्से में डाला
तुम सबने मुझे मुम्बई 1992 दंगा फिर दिया
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तुम सबने फिर गुजरात 2002 मिलकर जन संघार किया
तुम सबने मिल कर फिर अलीगढ़ 2006 मेरे चेहरे पे दे मारा
तुम यहीं रुकना नही चाहते थे
तुम सबने मिलकर मेरे ही सीने पे आतंकवाद किया
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तुम सबका दिल नही भरा तुमने देगंगा 2010 कर डाला
उससे भी न बुझी सबकी प्यास इसलिए तुम सबने आसाम 2012 कर डाला
यही सिलसिला जारी रहा फिर से तुम सब ने मुजफ्फरनगर 2013 कर डाला
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बताओ इन सब का जिम्मेदार कौन था हिन्दू था मुसलमान था
सिख था ईसाई था बौद्ध था जैन था गोरखा था या फिर कोई और था
जवाब दो मेरे सवालों का कौन था इन सब का जिम्मेदार
जवाब दो मेरे सवालों का कौन था इन सब जिहादो का जिम्मेदार
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जवाब दो मेरे सवालों का कौन था इन सब दंगो का जिम्मेदार
जवाब दो मेरे सवालों का कौन था इन सब आतंकवाद का जिम्मेदार
तुम सबके पास मेरे सवालों का जवाब नही है
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सिवाए एक दूसरे पर लाँछन लगाने के सिवा
मैं तुम्हे बताता हूँ जब तुम सब अपने स्वार्थ काम क्रोध में लिप्त थे
मैं किसी कोने में सिसकता तुम्हारे आतंकवाद को देख रहा था
तुम्हारे दंगो को देख रहा था तुम्हारे जिहाद को देख रहा था
सच कहूँ तुम सब हो तो मेरी ही औलाद मगर
शायद अभी भी तुममे से बहुतों के
खून में मेरे प्रति नमक हलाली नही है
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सच्चा मुसलमान गद्दार नही हो सकता क्योंकि उसके
आधे ईमान की शर्त ही यही है अपने मुल्क से वफ़ादारी
जो मुझसे वफादार नही वो मुसलमान नही
सच्चा हिन्दू कभी आतंकवाद का सहारा नही लेता
क्योकि मुझ पर ही देवताओं ने
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धर्म की स्थापना के लिए महाभारत और रामायण किया था
सच्चा मुसलमान कभी भी किसी मासूम का लहू नही बहा सकता
जिस इस्लाम मे थोड़ा ज्यादा पानी बहाना भी गुनाह हो
वह किसी मासूम का लहू बहाने की इजाजत कैसे देता
हाँ मैं हिंदुस्तान हूँ
देखो मुझे मैं तुम सबका हिन्दुस्तान हूँ
हाँ मैं हिंदुस्तान हूँ
मैं हिंदुस्तान हूँ
मैं लहू लुहान हूँ
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© 2017 Md. Danish Ansari
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14 विचार “मैं हिंदुस्तान हूँ- जिहाद, आतंकवाद, दंगा&rdquo पर;

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने अंसारी जी। क्यों कि मुझपर ही देवताओं ने धर्म स्थापना के लिए रामायण और महाभारत किया था का भाव नहीं समझ में आया। ऐसे लेख और कविता की समाज को बदलने के लिए और हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई। हिंदुस्तान शब्द का प्रयोग बहुत ही अच्छा लिखा है आपने जितनी तारीफ की जाय कम है।

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    1. मैं तो जहाँ भी फेसबुक या ट्विटर या कोई साइड हो जहाँ कहीं भी यह लिखा हुआ होता है कि कि आप क्या है – – – – – – – – – भरिये हिन्दू हैं कि मुसलमान मैं वहां यही भर्ती हूँ कि मैं इंसान हूँ। बल्कि धर्म के नाम पर फूट डालने वाले चिढ़ भी जाते हैं।

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    2. ऐसा है अंसारी जी इस कविता में (क्योंकि मुझपरही देवताओं ने धर्म स्थापना के लिए रामायण और महाभारत किया था का भाव बदल जा रहा है जैसे लग रहा है हिंदू ने मुस्लिम के लिए महाभारत रामायण किया हो। मुझे मैं बस एक को प्रदर्शित करता है इसलिए मुझे की जगह (हमारे लिए) एडिट कर दीजिए तो सबके लिए अर्थ क्लीयर हो जाएगा। आप मेरी बात को ध्यान और मानते हैं इसलिए बताया है।आगे आपको जो उचित लगे।

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      1. asal me agar app dekhe to is puri kavita me main kahi nahi hun yaha hindustan hai or uski aawam is puri kavita me sirf hindustan hi bol raha hai na ki koi vyakti ya vishesh is liye maine ise aisa likha hai

        mujh par hi devtao ne dharm ki sthapna ke liye ramayan or mahabharat kiya tha

        yani wo apni baat kar raha lekin fir bhi main apke sujhye vicharo pe vichar karunga

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  2. Jihaad,aatankwaad,danga sab ek hi rup hai jisme insaan ko maut ki ghaat utaar dete hain log….aur shesh bache logon ki aankhe us dard ko saaf bayaa karti hai…..kaash sabhi dharm samajhne se pahle insaan ko aur khud ko samajhte.hamne naa allah ko dekhaa naa bhagwaan ko parantu unke naam par jisne kal tak saath diyaa usi kaa katl kar diya…..bhayee aap bahut hi sundar likhaa hai….bahut khub👌👌👌

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  3. केवल’ मुझे’ शब्द को बोली। मुझे की जगह” हमारे लिए “और अच्छा अर्थ देगा। बाकी बहुत ही अच्छा लिखा है आपने। जितनी तारीफ की जाय कम है।

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