मौसम…….

मुझे गर्मी का मौसम कभी पसंद नही आया
न आज आया और न कल आया
चिलचिलाती धूप और पसीने के यह दौर
निराशा लिए यह मौसम मुझ पर आया
किसी की निराशा किसी की खुशियां है
खेतो की फसल की कटाई का मौसम है
गांव में तो यह जरा क़ाबिले बर्दास्त भी है
खुली जगह और खुला आसमान है
आम के बगीचों में दिन काट लेते है
खीरे और ककड़ियाँ चुपके से तोड़ लेते है
शाम होते ही गांव की पग डंडियों पे दौड़
रात को आसमान तकते हुए रात गुजरी है
आधुनिक संसाधनों की कमी तो है
जो खुशी गांव में है उसकी कमी सहरो में है
यही वजह है यह मौसम मुझे निराशा दिए हुए है
यहाँ मैं खुद को एक कमरे मे कैद कर लिया हूँ
कृत्रिम ठंडी हवा का साथ लिए बैठा हूँ
दिन शाम की निद्रा की चादर ओढ़ने लगती है
तब कहीं पैरों की जंजीरों में थोड़ा ढील पड़ती है
ये रात थोड़ा सुकून तो देता है मुझे रिहाई का
यह भी कहा ज्यादा देर ठहरता है
अगर मैं खुदा होता तो गर्मी का मौसम ना होता
कुछ ऐसा कर गुज़रता जो सबके हक़ में होता
मैं इंसान हूँ इसी लिए अपने ही दुख का भागी
मैं नदियों तालाबो नहरों को अपवित्र कर रहा हूँ
फिर भी मैं पुण्य का काम कर रहा हूँ
जंगलो की सफाई तो इतनी बारीकी से करता हूँ
इस सफाई से नाई भी हजामत कहा करता है
फिर खुद ही पौधरोपण का अभियान छेड़ता हूँ
अजीब फितरत है मेरी क्योकि मैं इंसान हूँ
खुद ही मुसीबतों को बुलावा देता हूँ
उन्हें कोसता हुआ निपटने की कोशिश करता हूँ
मेरी दुविधाओं के हल भी अजीबो गरीब है
ऐसी जीजे आजमाता हूँ खुद को नुकसान पहुचाता हूँ
उसे निपटने के लिए फिर कोई नई जाल बिछाता हूँ
मुझे गर्मी का मौसम कभी पसंद नही आया
न आज आया और न कल आया
वक़्त बीतता है मेरी आश बढ़ती है
बारिश के इंतेज़ार में यूँ ही ये मौसम गुजरती है
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Md. Danish Ansari ©
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9 विचार “मौसम…….&rdquo पर;

  1. क्या बात बहुत ही खूबसूरती से अपनी बड़ी बात कह डाली ।गर्मी का मौसम दुःख,दर्द पसंद नहीं परंतु करनी से कोई मतलब भी नहीं।बाबुल बोकर आम की उम्मीद वाह—-लाजवाब।

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