ज़िन्दगी के रंग……

जीवन के इंद्रधनुषी सफर में
हजारो रंग नज़र आते है,
परायों को अपना कहनेवाले
अच्छों को बुरा कहने वाले
कहीँ ना कहीँ मिल जाते है

रोज़ सफेद -काले और
सतरंगी जिंदगी नज़र आती है
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है।

Source: जिंदगी के रंग (कविता – 5)

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ये जीवन कहने को तो चार दीन का है
सच ये है कि यह संघर्स से घिरा हुआ है
ये संघर्स ही हमे अलग अलग रंगों में ढाल देते है
हमे पहले से बेहतर और कुछ नया बनाते है
फिर टूटता है और बिखर जाता है जैसे
बारिश में रोशनी टूट कर इंद्रधनुष बन जाता है
जो दुख और तकलीफ हो तो गहरा रंग ओढ़ लेते है
जब मन प्रसन्न तो स्वेत प्रकाश की भाति हो लेते है
यहा लोग ऐसे भी होते है पराये होते है पर अपने होते है
संघर्स बढ़ जाता है जीवन मे तो कुछ अपने साथ छोड़ देते है
कुछ जीवन के संघर्स को पार कर परमात्मा में विलीन होते है
तो कुछ संघर्स को खत्म कर हमेशा अंधकार में भटकते है
हमारे अस्तित्व की सच्ची वास्तविकता यही है
जीवन संघर्स है तो मृत्यु उस पर पूर्ण विराम होती है
जीवन संघर्स और अनंत संभावनाओं से भरा होता है
यही इसे बेरंग से, इन्द्रधनुष की तरह रंगीला बनाती है।
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यह कविता मैंने रेखा सहाय की कविता “ज़िन्दगी के रंग” पढ़ने के बाद उसे अपने लफ़्ज़ों में घड़ने की मामूली से कोशिश किया हूँ। ऊपर की आठ line रेखा सहाय जी की है उनके ब्लॉग से ली गयी है।
Md Danish Ansari
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10 विचार “ज़िन्दगी के रंग……&rdquo पर;

      1. लगता है इंग्लिश मीडियम वाले हैं। वैसे हिंदी लिखने की कोशिश अच्छी है। लेकिन हिंदी में एक मात्रा की गलती से भी अर्थ बदल जाता है। आपके इस पोस्ट में अक्षरों का और मात्रा मिस्टेक है जैसे आपने दीन लिखा है जबकि दिन होना चाहिए। दीन का अर्थ गरीब से लगाया जाता है।

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      2. Sorry की आवश्यकता नहीं है। आप सुधार करले इस लिए सुझाव दिया है। नहीं तो ब्लॉग पर गलती बताने पर भी नराज हो जाते हैं। पर मेरा विचार है कि जब एडिटर सुधार हो सकता है तो गलती पता चलना चाहिए।

        Liked by 1 व्यक्ति

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