शहर 2……

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शहर इसमें मेरे अस्तित्व का एक बड़ा हिस्सा मौजूद है।
यही मैं जन्मा हूँ यही मैं खेला और पढ़ा हूँ।
इसकी सकडको पे न जाने कितने ही बार ठोकर खा के गिरा हूँ।
फिर संभला और खड़ा हुआ और आगे बढ़ा चलता गया।
ये मेरा शहर है ये हमारा शहर मैं इस शहर का परिंदा हूँ।
इस शहर के नुक्कड़ और चौराहों पर कई यादे बिसरे है।
चौराहों के किनारे चाट समोसे के ठेलो पर दोस्ती के कई रंग देखे है।
शाम की अंतिम किरणों के साथ नए शहर का उदय देखता हूँ।
शहरों की खास बात यह है कि यहां बाहर रोशनी बहुत है।
पर यह भी सच है कि यहां अंदर काली स्याह अंधेरा बहुत है।
जब अकेला होता हूँ तो अक्सर तन्हाई मुझे जकड़ती है।
फिर दरवाजे से दोस्तो की आवाज़ तन्हाई से मुझे रिहा करती है।
मेरा अब गाँव मे तो कोई नही है जो है बस ये शहर ही है।
यहा लोग स्वार्थी है मगर अपने है क्योंकि यहा अक्सर
तन्हाई आपको जकड़ती है और दम घोट देती है।
खुद के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए मैं स्वार्थी हो जाता हूँ।
यहाँ मुहब्बत की अपनी अलग परिभाषा है
अगर तुममे स्वार्थ नही तो तुम मुहब्बत नही कर सकते।
कुछ लोग है जो बीच बीच मे सच्ची मुहब्बत की परिभाषा देते है।
कुछ ऐसे लोग भी होते है जो मुहब्बत की मिशाल बनते है।
ईश्वर ही जाने वो कितने सच्चे और उनका इश्क कितना सच्चा है।
ये मत समझना के मैं आस्थावादी हूँ और न कि ये की मैं नास्तिक हूँ।
मैं खुद को आस्थावादी और नास्तिकों के बीच पाता हूँ।
ये जो मेरा शहर है इसके अच्छे कर्म भी है और बुरे भी
इसके बुरे कर्म अक्सर अच्छे कर्मों को ढक लिया करते है।
मेरा यह विश्वास है कि मैंने अपनी ज़िंदगी का हर पन्ना खुद लिखा है।
लोग कहते है कि उनकी किश्मत ईश्वर लिखता है।
अक्सर लोग कहते है वो ईश्वरवादी है इसलिए ऐसा विश्वास करते है।
पर वो झुटे है असल मे वो अपनी असफलताओं को ईश्वर पे लाद देते है।
अपनी सभी सफलताओ को खुद की मेहनत का प्रतिफल समझते है।
ये वो लोग है जो ढोंग रचते है और धर्म का व्यवसाय करते है।
हम शहरी लोग जीने के लिए काम नही करते काम करने के लिए जीते है।
इस तरह की तमाम विचारो और व्याभिचारो के बावजूद।
मुझे ये शहर पसंद है क्योंकि मैं इसी शहर का परिंदा हूँ।
तमाम व्यवस्थाओं और अव्यवस्थाओ के बीच
यहाँ खुशियों के छोटे छोटे बाग़ बनते उजड़ते रहते है।
ये जो बाग़ है असल मे कुछ त्योहारों और सामाजिक अनुष्ठान ही है।
जब छठ होली दीवाली होती है हम सब साथ उसे मना लेते है।
जब ईद मुहर्रम बकरीद होती है हम साथ सेवइयां खा लेते है।
ये प्राचीन संस्कृति ही हमे एक दूसरे से जोड़ते हुए एक सूत्र में बांधती है।
हमे और हमारे शहर को उसके वजूद को नष्ट होने से बचाती है।
ये मेरा शहर है ये हमारा शहर है और मैं इस शहर का परिंदा हूँ।
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Md Danish Ansari
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4 विचार “शहर 2……&rdquo पर;

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है। लेकिन आप की लेखनी कुछ लिखना चाहती है और बहककर लिख और जाती है इसका कारण मेरा कवियत्री मन ये कहता है कि या तो आप हकीकत को कल्पना में जुड़ जाते हैं या कल्पना कर लिखते हुए हकीकत जोड़ देते हैं। ऐसे ही यदि लिखते हैं तो लेखनी आजाद हो या मुक्त भाव से नहीं लिख पायेगी। इस लिए आप या तो कल्पना ही लिखो या हकीकत ही। वैसे काल्पनिक वो लिखते हैं जो कवि या राइटर प्रोफेशनल होते हैं। लेकिन हकीकत लिखने के लिए समस्या से जूझने के लिए बहुत बड़ा जिगर रखना पड़ता है क्योंकि जिंदगी से जुड़े हर व्यक्ति के राज यानी गड़े मुर्दे उखड़ने लगते हैं।

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