शहर……

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ये जो शहर कभी पराया था अपना सा लगने लगा है
बड़ी मुदत्तो बाद हमने शहर को शहर जैसा देखा है
न जाने कितने साल गुजार दिए हमने अपनी जिंदगी के
अभी तलक हमने इस शहर को ठीक से जाना कहा है
ये जो लोग है मुझे भीड़ लगते थे तब यहाँ दम घुटता था
जो तू आ गया है ये भीड़ नही ये लोग मुझे अच्छे लगते है
इस शहर को मैं महसूस कर सकता हूँ ये शहर मुझे महसूस करता है
इसके सड़को पे दौड़ती रफ्तार की अविष्कारे मानो जैसे
जैसे मैं अपने रगों में दौड़ता हुआ लहू महसूस करता हूँ
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जब तुझे पहली दफा इमारत के बुलंद ऊंचाई पे देखा था
मुझे महसूस हुआ मेरे ख्वाब बुलंदी को छूने वाले है
इस शहर की हर इमारत मेरे ख्वाब की तामीर सी लगती है
जब बादे सबा तुझे छू कर मुझ तक पहुंचती है तो
महसूस होता है कि इस शहर में तू भी कहीं रहती है
जो तुझे तलासते हुए मैं तुझ तक पहुंचा बड़ी देर सी हो गयी मुझे
तेरी रुखसती का वक़्त उस पर मेरी दीवानगी की हद्द
मुझे पता ही न चला कब मैं इस शहर के लिए पराया हो गया
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ख़ाक हूँ अपने इस यारे शहर का और उसके इंतेज़ार में हूँ
वो जो लौटेगा एक दिन अपने शहर को तो
उसके तलवो का मैं बोसा लूंगा इसके इंतेज़ार में हूँ
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मेरी इतनी ही ख्वाहिश है उससे अगर उसे भी मुहब्बत थी इस शहर से
तो एक बार बड़ी शिद्दत से अपने शहर की मिट्टी चुम लेना
जो तेरे लबो से मेरी ख़ाक लिपट जाएगी तो मेरी हर प्यास भुज जाएगी
मेरे रूह को सुकून और मुझे इस कैद से आज़ादी मिल जाएगी
तुझे तो खबर भी न थी कि मुझे तुमसे बेपनाह मुहब्बत है
जुदाई का गम यूं था के हम जल कर अब ख़ाक हो गए है
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मेरी इस मुहब्बत की दास्तान भी अजीब है यारो
न उसका रूठना है और न मेरा मनाना बस अकेले ही चलते जाना
दोस्तो अब तुमसे ही मेरी एक उम्मीद है याद रखना मुझे
याद रखना मेरी मुहब्बत को जो इस शहर में मैंने लिखी थी
इसके हर हर्फ़ पर वक़्त के थपेड़ों से इसे मिटने न देना
इसके हर्फ़ हर्फ़ को तुम दोहरा कर इसे ज़िंदा रखना
चलता हूँ मेरा वक़्त तो पूरा हो गया और
अब ये सफर और शहर तुम्हारा हो गया!!!
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Md Danish Ansari
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8 विचार “शहर……&rdquo पर;

      1. मेरा विचार नहीं मिला या समय नहीं। शरीर के चोट तो फिर भी भर जाते हैं पर शब्दों के नहीं। पीछे जाकर ठीक करना नहीं चाहते या आता नहीं। मैं इसीलिये मेहनत कर अलग अलग पोस्ट पे कमेंट कर बताया कि आप को असानी हो।

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