औरत…..

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औरत दूसरी पहलु है मुहब्बत की
मूरत है स्नेह प्रेम त्याग की
इससे घर भी बस्ते है और उजड़ते भी
इसकी परिश्रम का परिणाम सफलता भी
ये वो प्रकाश है जो नज़र में तो नही है
पर इसका प्रभाव हर कही है
इसकी मुहब्बत जिसे भी मिली है
वो सदा सफलता के शीर्ष पर है
लोग भूल जाते है कि ये वस्तु मात्र नही सम्भोग की
ये प्रतिक है अटूट विश्वास प्रेम और सहानुभूति की
इसके कई रूप रहे है इन युगों में अब तलक
कही दुर्गा तो काली कही सुर्प नखा तो कैकई
तन ही सिर्फ कोमल नही दिल भी बड़ा मर्म है
खुद को खपा कर अग्नि में रोशन ज़िन्दगी को करती
खुद की ख्वाहिश को दफ़्न कर हर ज़रूरत पूर्ति की
वो औरत है जो भूखे भी रहे और सब का पेट भरे
हर दुःख दर्द सहे फिर बी उफ़ न करे
ये जड़ है हर परिवार और समाज का
ये अटूट प्रतिक है अन्नपूर्णा के धन का
ये पुरुष की भांति है पर कुछ अलग सी है
उस की प्रेम भावना ने सब पर जीत की है
ये आयशा भी है ये मरियम भी है
ये लक्ष्मी भी है पार्वती भी है
ये जघन्य अपराधों की देवी भी है
ये मदर टेरेसा भी है सुनीता विलियम्स भी है
ये सानिया मिर्ज़ा और सानिया नेहवाल भी है
ये नदियों की भांति एक युग से दूसरे युग में बहती है
सदा अपना रूप बदलते हुए और निखरती है
सर्म हया इसके गहने आत्म सम्मान इसकी दौलत है
सौप दे खुद को किसी को तो ये सब कुछ लुटाती है
ये औरत है जो ख़ाक करके खुद को
घर रोशन कर जाती है
बेटी बीवी बहु माँ बहिन दोस्त इसके रूप अनेक
न मारो इसे न लूटो इसे इस पे तू विश्वास करके देख
ये औरत है…………
______________________________________________________________
ये कविता समर्पित है मेरी माँ बहिन और भाभी को और दुनिया की हर एक औरत को जो इन्ही में से किसी एक रूप में अपने परिवार को अपनी अतह प्रेम स्नेह और लगाओ से लगातार सींच रही है।
Md. Danish Ansari
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8 विचार “औरत…..&rdquo पर;

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